Monday, 30 January 2017

संजय लीला भंसाली पद्मावती सूटिंग

भंसाली प्रकरण में बॉलीवुड इकठ्ठा होकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहा है। विचारणीय बात है कि क्या व्यावसायिक फायदे के लिए ऐतिहासिक प्रकरणों का विद्रूप बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता भी है।
और दूसरी बात, किसी को गुस्सा आया और उसने अपने गुस्से को 'चांटा रसीद कर' अभिव्यक्त किया, तो इस प्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा क्या नहीं होनी चाहिए?
संस्कृति और इतिहास का विद्रूप बनाना तो सारे देश के गाल पर चांटा है। और शारीरिक चाँटे का असर तो ऐसे चाँटे से कहीं कम है।

मेरे ख्याल से अगर कोई हिंसात्मक तरीके से भी अपनी भावना की अभिव्यक्ति करता है तो उसकी आलोचना का अधिकार किसी को नहीं है। बहुत हुआ तो कानून उसको ऐसे कृत्य के लिए निर्धारित सजा भर दे सकता है।

आशा है देश के गाल पर चाँटे रोकने के लिए कानून के अंतर्गत सजा भुगतने को तैयार युवा सामने आएंगे और संजय लीला भंसाली और अनुराग कश्यप जैसों को चाँटे लगाते रहेंगे।

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