Saturday, 9 April 2016

Excise Duty

क्या लोहा सोने से भी महंगा है ?
तो जब लोहे पर इक्साइज ड्यूटी  है तो सोने पर क्यों नहीँ  हो सकती ?

.... क्या स्वर्णकार  देश के सबसे गरीब लोग हैं ...?? 
   बिल्कुल नहीँ  !  आम राय तो यही है कि यह वर्ग भारत के  सबसे सम्पन्न  वर्गों में आता है ।
      तो फिर मात्र एक प्रतिशत  के इक्साइज टैक्स पर इतना रोना धोना क्यों ?   क्या धंधे में पारदर्शिता  रखने की अपेक्षा उनसे नहीँ  की जानी चाहिए ..?

       ऐसा नहीँ  है कि देश में पहली बार कोइ टैक्स  लगा है । इससे पहले भी सेवा कर ....  या अनेक प्रकार के सेस लगते रहे हैं ।
       स्वर्णाभूषणों पर दस प्रतिशत  से  तीस प्रतिशत  तक मेकिंग चार्ज के नाम पर ले लेते है यह लोग  ..... इस पर कोई  भी स्पष्ट नियम नहीँ  है ।

       और सबसे बुरी  बात तो यह है कि आज गहने खरीद कर कल वापस करने जांय तो  तीस प्रतिशत  तक बट्टा काट लिया  जाता है   ....!!

      मुनाफाखोरी  को समझें -

1.मान लीजिए आप एक लाख रुपये(₹100000) का गहना खरीदते हैँ । अब इसमें मेकिंग चार्ज पच्चीस प्रतिशत है । इसका अर्थ यह हुआ  कि वास्तविक सोना पचहत्तर हजार(₹75000) का ही है ,  तथा बनाने का चार्ज   पच्चीस हजार(₹25000) रुपये ।

      अगले दिन जब आप वापस करने जाते हैं तो सोने की मूल कीमत पर बीस प्रतिशत का बट्टा(₹12000) काट लिया जाता है ।
      और आपके हाथ बचते हैँ  महज ₹5800 ।

  इसका अर्थ  यह हुआ कि सुनार ने आपकी खून-पसीने की कमाई के बयालिस हजार रुपये  (₹42000)  बैठे हडप लिया .. !

2. आभूषण खरीदते समय गहने में लगे सस्ते पत्थरों  तथा सजावटी समाग्री को सोने की कीमत पर तौल कर दिया जाता है   ..... किन्तु  अगले  ही दिन जब आप वापस करने जाऐंगे तो सुनार  पत्थरों को काट कर अलग कर देगा तथा सिर्फ सोना ही तौल कर लेगा  ... वह भी बट्टा काट कर ...!    

3.  अक्सर आपसे बताया जाता है कि सोना 22 कैरेट का है  ... किन्तु  वह होता है  20 या 18 कैरेट का  !
      

4.  आप पुराने आभूषण  को जब पालिश करवाने के लिए  ले जाते हैं   ... तो एक्वेरेजिया नामक तेजाब से गहने को धो कर कुछ सोना ही निकाल लेते हैं ।
     गहना तो चमक जाता है  .... पर आपका सोना कम हो जाता है  !

     ऐसा नहीँ  कि इमानदार  सुनार हैं ही नही  .....   किन्तु  सत्य यह भी है कि  उपरोक्त बेइमानी बडे स्तर पर हो रही है ।

         और अंतिम  बात ...
      क्या सूनारों के हालात देश के किसानों से भी  खराब हैं ?

    आज सूखा ग्रस्त महाराष्ट्र  का किसान महज_तीन_रुपये  प्रति कीलो की दर से प्याज बेच कर टेंकर का पानी खरीद रहा है!
      कितने पत्रकारों/मीडिया  ने इस विषय पर ध्यान आकर्षित  किया?

        किसान को खाद या कीट नाशक दवाऐं किस दर पर मिल रहे है   ... या फिर मिल ही नहीँ  रहे हैं,  इस विषय पर कितने पत्रकारों या मीडिया  ने विश्लेषण किया है?

          आज जबकि मोदी सरकार ने किसानों के हित में अनेक सुरक्षा योजना तथा बीमा की ब्यवस्था  कर रही है तो , देश के प्रबुद्ध  नागरिकों को स्वर्णाभूषणों पर इस एक प्रतिशत टैक्स  को सहर्ष  स्वीकार  करना चाहिए ।

NIT

(NIT में देशभक्त छात्रों पर हुए जुल्म पर मेरी यह नवनिर्मित मौलिक रचना....)

"अखंड भारत के मानचित्र मे भयानक ये पंचर देखा ,
भारत माता की जय पर लाठीचार्ज का मंजर देखा ।

खुद्दारी तक बेच रहे हैं कुछ हमारे खादी वाले ,
देशभक्तों पे लाठी भांज रहे देखो ये खाकी वाले ।

भारत का जयकारा करने वालों को जमकर के पीटा ,
दौड़ा दौड़ाकर मारा उन्हें पकड़ पकड़कर घसीटा ।

न जाने कैसी ये बिजली आफत की मेरे हिंद में चमकी है ,
देशभक्त लड़कियों को मिल रही रेप वाली धमकी है ।

JNU में बाहर रहे NIT में घुसे सिपाही कैसी ये गाथा है ,
पुलिस छिन ले गई तिरंगा तो झुक गया शर्म से माथा है ।

देश के टुकड़े कहने पर पुलिस बाहर इंतजार करती है ,
भारत माता की जय वालों को कैंपस में घुस मारती है ।

सरकार बनते ही ये कैसी भाषा का आगाज हुआ ,
डिप्टी सीएम कह रहे मामूली लाठी चार्ज हुआ ।

निर्मल सिंह भूल रहे पार्टी के इतिहास को ,
लाल चौक पर तिरंगे से मिली हुई संत्रास को ।

श्रीनगर के चौराहे पर गजब की हुंकार लगाई थी ,
भारत माता के जयकारे पर भाजपा ने लाठी खायी थी ।

उसी धरा पर पाकपरस्तों नें जमकर उत्पात मचाया है ,
शहीदों की कुर्बानी को कितना अधिक लजाया है ।

रो रही होगी आत्मा श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ,
खुश हो रही होगी आत्मा मुफ्ती सी खुदगर्जी की ।

भारत के जर्रे जर्रे में जरुरी फिर से अब ये नारा है ,
जहां बलिदान हुए मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है ।

राष्ट्र विरोधी बात करे वही सुविधा से जिंदा है यहां ,
पात पात भारतमाता हो रही अब तो शर्मिंदा यहां ।

कितना है अफसोस ये जो देश चाट रहे हैं ,
हम उन्हें सीने से लगाकर समझौते बांट रहे हैं:।

"मोदी जी" याद रखना अपने वतनपरस्त परिवेश को , ��
महबूबा के चक्कर में भूलमत जाना अपने अखंड देश को ।

समय रहते खत्म कर दो रोज की इस तकरार को ,
वरना जनता माफ न करेगी जुमलों वाली सरकार को ।

उठो जवानों उठो दीवानों भारत मां की शुभ संतानों ,
देशद्रोह के उठे सर पर राष्ट्रवाद का सीना तानो ।

हाय हैलो टाटा बाय बाय नहीं राष्ट्रवाद वाला मुंह खोलो ,
आओ "मित्र" एक बार मेरे संग 'भारत माता की जय' बोलो|

Monday, 4 April 2016

New Generation

कपड़े हो गए छोटे
लाज कहा से आए
रोटी हो गई ब्रैड
ताकत कहा से आए
फूल हो गए प्लास्टिक के
खुशबू कहा से आए
चेहरा हो गया मेकअप का
रूप कहाँ से आए
शिक्षक हो गए टयुशन के
विद्या कहाँ से आए
भोजन हो गए होटल के
तंदरुस्ती कहाँ से आए
प्रोग्राम हो गए केबल के
संस्कार कहाँ से आए
आदमी हो गए पैसे के
दया कहाँ से आए
धंधे हो गए हायफाय
बरकत कहाँ से आए
भक्ति करने वाले स्वार्थी हो गए
भगवान कहाँ से आए
रिश्तेदार  हो गये व्हाट्सऐप के
मिलने कहाँ से आए....

Saturday, 2 April 2016

वीर सावरकर - एक मिशाल

हमारे देश के क्रान्तिकारी केवल और केवल महान है परन्तु गद्दार कभी नहीं।
वीर सावरकर को एक कथित नेता ने गद्दार कहा हैं। भारत देश की विडंबना देखिये जिन महान क्रांतिकारियों ने अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया। उन क्रांतिकारियों के नाम पर जात-पात, प्रांतवाद, विचारधारा, राजनीतिक हित आदि के आधार पर विभाजन कर दिया गया। इस विभाजन का एक मुख्य कारण देश पर सत्ता करने वाला एक दल भी रहा। जिसने केवल गांधी-नेहरू को देश के लिए संघर्ष करने वाला प्रदर्शित किया। जबकि जो क्रान्तिकारी कांग्रेस की विचारधारा से अलग रहकर कार्य कर रहे थे उनके योगदान की चर्चा कम ही सुनने को मिलती है। इस कारण से यह भ्रान्ति पैदा हो गई हैं कि देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई थी? सत्य यह हैं कि इस नये विकृत इतिहास में स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारियों, अमर हुतात्माओं की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई हैं।
हमारे विचार की पुष्टि हमारे महान क्रांतिकारी करते है। पेशावर कांड के मुख्य क्रांतिकारी चन्द्र सिंह गढ़वाली भेंट वार्ता में कहते है। इस आज़ादी का श्रेय कांग्रेस देना कोरा झूठ हैं। मैं पूछता हूँ की ग़दर पार्टी, अनुशीलन समिति, एम.एन.एच., रास बिहारी बोस, राजा महेंदर प्रताप, कामागाटागारू कांड, दिल्ली लाहौर के मामले, दक्शाई कोर्ट मार्शल के बलिदान क्या कांग्रेसियों ने दिए हैं, चोरा- चौरी कांड और नाविक विद्रोह क्या कांग्रेसियों ने दिए थे? लाहौर कांड, चटगांव शस्त्रागार कांड, मद्रास बम केस, ऊटी कांड, काकोरी कांड, दिल्ली असेम्बली बम कांड , क्या यह सब कांग्रेसियों ने किये थे? हमारे पेशावर कांड में क्या कहीं कांग्रेस की छाया थी? अत: कांग्रेस का यह कहना की स्वराज्य हमने लिया, एकदम गलत और झूठ हैं। कहते कहते क्षोभ और आक्रोश से चन्द्र सिंह जी उत्तेजित हो उठे थे। फिर बोले- कांग्रेस के इन नेताओं ने अंग्रेजों से एक गुप्त समझोता किया था। जिसके तहत भारत को ब्रिटेन की तरफ जो 18 अरब पौंड की पावती थी, उसे ब्रिटेन से वापिस लेने की बजाय ब्रिटिश फौजियों और नागरिकों के पेंशन के खातों में डाल दिया गया। साथ ही भारत को ब्रिटिश कुम्बे (commonwealth) में रखने को मंजूर किया गया और अगले 30 साल तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सेना को गैर क़ानूनी करार दे दिया गया। मैं तो हमेशा कहता हूँ- कहता रहूँगा की अंग्रेज वायसराय की ट्रेन उड़ाने की कोशिश कभी कांग्रेस ने नहीं की तो क्रांतिकारियों ने ही। हार्डिंग पर बम भी वही डाल सकते थे न की कांग्रेसी नेता। सहारनपुर-मेरठ- बनारस- गवालियर- पूना-पेशावर सब कांड क्रांतिकारियों से ही सम्बन्ध थे, कांग्रेस से कभी नहीं।
(सन्दर्भ- श्री शैलन्द्र जी का पांचजन्य के स्वदेशी अंक 16 अगस्त 1992 में लेख)
वीर सावरकर का यह चिंतन भी गढ़वाली जी की टिप्पणी को सिद्ध करता हैं जब उन्होंने कहा था की आज़ादी केवल अहिंसा से मिली हैं उन हज़ारों गुमनाम शहीदों का अपमान हैं जिन्होंने अत्याचारी अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष लिया एवं अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। भारतीय स्वतंत्रता के लिये आरम्भ से ही समय-समय पर भारत के विभिन्न भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विप्लव होते रहे। भारतीय स्वतंत्रता के लिये आरम्भ से ही समय-समय पर भारत के विभिन्न भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विप्लव होते रहे। इसकी पुष्टि इस सूची को देखकर पता चलती हैं।
1757 से अंग्रेजी राज द्वारा जारी लूट तथा भारतीय किसानों, मजदूरों, कारीगरों की बर्बादी, धार्मिक, सामाजिक भेदभाव ने जिस गति से जोर पकड़ा उसी गति से देश के विभिन्न हिस्सो मे विद्रोंह की चिंगारियाँ भी फूटने लगीं, जो 1857 में जंग-ए-आजादी के महासंग्राम के रूप में फूट पड़ी। 1757 के बाद शुरू हुआ सन्यासी विद्रोह (1763-1800), मिदनापुर विद्रोह (1766-1767), रगंपुर व जोरहट विद्रोह (1769-1799), चिटगाँव का चकमा आदिवासी विद्रोह (1776-1789), पहाड़िया सिरदार विद्रोह (1778), रंगपुर किसान विद्रोह (1783), रेशम कारिगर विद्रोह (1770-1800), वीरभूमि विद्रोह (1788-1789), मिदनापुर आदिवासी विद्रोह (1799), विजयानगरम विद्रोह (1794), केरल में कोट्टायम विद्रोह (1787-1800), त्रावणकोर का बेलूथम्बी विद्रोह (1808-1809), वैल्लोर सिपाही विद्रोह (1806), कारीगरों का विद्रोह (1795-1805), सिलहट विद्रोह (1787-1799), खासी विद्रोह (1788), भिवानी विद्रोह (1789), पलामू विद्रोह (1800-02), बुंदेलखण्ड में मुखियाओं का विद्रोह (1808-12), कटक पुरी विद्रोह (1817-18), खानदेश, धार व मालवा भील विद्रोह (1817-31,1846 व 1852), छोटा नागपुर, पलामू चाईबासा कोल विद्रोह (1820-37), बंगाल आर्मी बैरकपुर में पलाटून विद्रोह (1824), गूजर विद्रोह (1824), भिवानी हिसार व रोहतक विद्रोह (1824-26), काल्पी विद्रोह (1824), वहाबी आंदोलन (1830-61), 24 परगंना में तीतू मीर आंदोलन (1831), मैसूर में किसान विद्रोह (1830-31), विशाखापट्टनम का किसान विद्रोह (1830-33), मुंडा विद्रोह (1834), कोल विद्रोह (1831-32) संबलपुर का गौंड विद्रोह (1833), सूरत का नमक आंदोलन (1844), नागपुर विद्रोह (1848), नगा आंदोलन (1849-78), हजारा में सय्यद का विद्रोह (1853), गुजरात का भील विद्रोह (1809-28), संथाल विद्रोह (1855-56) तक सिलसिला जारी रहा। 1857 का संघर्ष संयुक्त भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। नील विद्रोह (सन् 1850 से 1860 तक),कूका विद्रोह (सन् 1872),वासुदेव बलवंत फड़के के मुक्ति प्रयास (सन् 1875 से 1879),चाफेकर संघ (सन् 1897 के आसपास),बंग-भंग आंदोलन (सन् 1905),यूरोप में भारतीय क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयास (सन् 1905 के आसपास),अमेरिका तथा कनाडा में गदर पार्टी (प्रथम विश्वयुद्ध के आगे-पीछे),रासबिहारी बोस की क्रांति चेष्टा, हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ (सन् 1915 के आसपास), दक्षिण-पूर्व एशिया में आजाद हिंद आंदोलन,नौसैनिक विद्रोह (सन् 1946) आदि अनेक संघर्षों में से कुछ संघर्ष हैं जिनमें कांग्रेस या गांधीजी का कोई योगदान नहीं हैं। इसलिए इस बात को स्वीकार करना चाहिए की देश को आज़ादी हमारे महान क्रांतिकारियों के कारण मिली हैं नाकि कांग्रेस के कारण मिली हैं।
महात्मा गांधी जी निश्चित रूप से महान थे मगर अन्य का सहयोग भी कोई कम नहीं था। ,उनके योगदान को भुला देना कृतघ्नता है। उन क्रांतिकारियों को सम्मान पूर्वक श्रद्धांजलि देने का सबसे कारगर प्रयास यही होगा की निष्पक्ष रूप से इतिहास के पुनर्लेखन द्वारा उनके त्याग और समर्पण को आज की युवा पीढ़ी को अवगत करवाना चाहिए।जिन शहीदों के प्रयत्नों व त्याग से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अनेकों को स्वतंत्रता के बाद भी गुमनामी का अपमानजनक जीवन जीना पड़ा। ये शब्द उन्हीं पर लागू होते हैं-

उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया,जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन।
जगमगा रहे हैं मकबरे उनके, बेचा करते थे जो शहीदों के कफन।।

Thursday, 31 March 2016

वीर सावरकर - एक मिशाल

क्या वीर सावरकर देशद्रोही या गद्दार थे-
1. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विर ोध किया और कहा कि वो हमारे Hशत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.?
2. वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ...
3. विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी...
4. वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र 'इन्डियन ओपीनियन' में गाँधी ने निंदा की थी...
5. सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया...
6. सावरकर पहले भारतीय थे जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुरमाना किया... इसके विरोध में हड़ताल हुई... स्वयं तिलक जी ने 'केसरी' पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा...
7. वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफादार होने की शपथ नही ली... इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नही दिया गया...
8. वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को '1857 का स्वातंत्र्य समर' नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया...
9. सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे '1857 का स्वातंत्र्य समर' पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था...
10. '1857 का स्वातंत्र्य समर' विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंह ने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी... भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी... पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी...
11. वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे...
12. सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नही मिला और बंदी बनाकर भारत लाया गया...
13. वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी...
14. सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले- "चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया."
15. वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सजा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक आजादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पोंड तेल प्रतिदिन निकाला...
16. वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखी और 6000 पंक्तियाँ याद रखी...
17. वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे, जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आजादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा...
18. वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि-
'आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका.
पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः.'
अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभू है जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भू है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है...
19. वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने 30 वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया... देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था...
20. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका 26 फरवरी 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था...
21.वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधन पर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था....
22. वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया...
23. वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से UPA सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया...
वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने कालापानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया..
.24. महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी-देशभक्त, उच्च कोटि के साहित्य के रचनाकार,  के मंत्रदाता, हिंदुत्व के सूत्रधार वीर विनायक दामोदर सावरकर पहले ऐसे भव्य-दिव्य पुरुष, भारत माता के सच्चे सपूत थे, जिनसे अन्ग्रेजी सत्ता भयभीत थी, आजादी के बाद नेहरु की कांग्रेस सरकार भयभीत थी और आज  कांग्रेस उन्हे गद्दार बता रही है ||
वीर सावरकर जिंदाबाद

Monday, 28 March 2016

We Support Dr.Narang

डॉ नारंग की मार्मिक हत्या :
दरबारों में ख़ामोशी है,हल ना मिला सवालों को,
आज दादरी चिढ़ा रही है,कायर दिल्ली वालों को,

कोई आखिर क्यों बोलेगा,किसकी किस्मत फूटी है,
हिन्दू मरा,मरे,घोड़े की टांग कहाँ पर टूटी है,

एक मुसलमाँ के मरने पर,सब के सब हिल जाते हैं,
जब हिन्दू का बेटा मरता,होंठ सभी सिल जाते हैं,

क्या कसूर था उसका,सबने मिलकर शोर मचाया था,
मस्ज़िद के अंदर क्या उसने मांस सूअर का खाया था?

पैगम्बर को गाली दी थी?या कुरान को फाड़ा था?
मुस्लिम लड़की को छेड़ा था?या घर बार उजाड़ा था?

वो तो एक चिकित्सक भर था,मानव धर्म निभाता था,

हिन्दू और मुसलमानो में फर्क नही कर पाता था,

उसका बस कसूर ये ही था,राष्ट्रप्रेम में झूल गया,
बंगलादेश मैच में हारा,और ख़ुशी से फूल गया,

भाईचारे की होली पर,कैसा ये उपहार दिया?
अमन पसंद भीड़ ने उसको पीट पीट कर मार दिया,

कहाँ गये अब राहुल भैया,कहाँ केजरीवाल गए,
किस बिल में आखिर छिपने को,कायर सभी दलाल गए,

रोती रहे दादरी पर वो चैनल वाले कहाँ गये?
कहाँ गया ढोंगी रवीश,वो खबर मसाले कहाँ गए,

काण्ड दादरी पर सब को अवसाद दिखाई देता था,
वो अख़लाक़ मियां सबका दामाद दिखाई देता था,

आज हमें लगता है खुश हैं इक हिन्दू के मरने पर,
कोई नही आज बैठेगा शायद फिर से धरने पर,

टोपी वालों के खरोंच भी आये तो चिल्लाते हैं,
हिन्दू कहीं मरे तो ये अवकाश मनाने जाते हैं,

देशवासियों कब जागोगे?इंतज़ार मत और करो,
कहाँ खड़े हो दिल्ली वालों,कुछ हालत पर गौर करो,

मत अपना मुँह मीठा करिये,ज़हर सने रसगुल्लों से,
आस अमन की कभी न रखिये,इन ज़ाहिल कठमुल्लों से,

एक अगर न हुए,घरों से रोज उतारे जायेंगे,
किसी रोज हम सभी भीड़ के हाथो मारे जायेंगे,

या तो फिर गुलाम हो जाना,या आखिर तक लड़ लेना,
सारे घर को ज़हर खिलाना,या फिर कलमा पढ़ लेना,

                         ------कवि गौरव चौहान
नोट- ये कविता सिर्फ बांग्लादेशी मुसलामानों की आलोचना करती है(चाहे जैसे शेयर करें पर करें ज़रूर ताकि दिल्ली में रहने वाला हर मध्यमवर्गीय हिन्दू परिवार अपना भविष्य सुरक्षित कर सके|

We Support Dr.Narang

डॉ नारंग की मार्मिक हत्या :
दरबारों में ख़ामोशी है,हल ना मिला सवालों को,
आज दादरी चिढ़ा रही है,कायर दिल्ली वालों को,

कोई आखिर क्यों बोलेगा,किसकी किस्मत फूटी है,
हिन्दू मरा,मरे,घोड़े की टांग कहाँ पर टूटी है,

एक मुसलमाँ के मरने पर,सब के सब हिल जाते हैं,
जब हिन्दू का बेटा मरता,होंठ सभी सिल जाते हैं,

क्या कसूर था उसका,सबने मिलकर शोर मचाया था,
मस्ज़िद के अंदर क्या उसने मांस सूअर का खाया था?

पैगम्बर को गाली दी थी?या कुरान को फाड़ा था?
मुस्लिम लड़की को छेड़ा था?या घर बार उजाड़ा था?

वो तो एक चिकित्सक भर था,मानव धर्म निभाता था,

हिन्दू और मुसलमानो में फर्क नही कर पाता था,

उसका बस कसूर ये ही था,राष्ट्रप्रेम में झूल गया,
बंगलादेश मैच में हारा,और ख़ुशी से फूल गया,

भाईचारे की होली पर,कैसा ये उपहार दिया?
अमन पसंद भीड़ ने उसको पीट पीट कर मार दिया,

कहाँ गये अब राहुल भैया,कहाँ केजरीवाल गए,
किस बिल में आखिर छिपने को,कायर सभी दलाल गए,

रोती रहे दादरी पर वो चैनल वाले कहाँ गये?
कहाँ गया ढोंगी रवीश,वो खबर मसाले कहाँ गए,

काण्ड दादरी पर सब को अवसाद दिखाई देता था,
वो अख़लाक़ मियां सबका दामाद दिखाई देता था,

आज हमें लगता है खुश हैं इक हिन्दू के मरने पर,
कोई नही आज बैठेगा शायद फिर से धरने पर,

टोपी वालों के खरोंच भी आये तो चिल्लाते हैं,
हिन्दू कहीं मरे तो ये अवकाश मनाने जाते हैं,

देशवासियों कब जागोगे?इंतज़ार मत और करो,
कहाँ खड़े हो दिल्ली वालों,कुछ हालत पर गौर करो,

मत अपना मुँह मीठा करिये,ज़हर सने रसगुल्लों से,
आस अमन की कभी न रखिये,इन ज़ाहिल कठमुल्लों से,

एक अगर न हुए,घरों से रोज उतारे जायेंगे,
किसी रोज हम सभी भीड़ के हाथो मारे जायेंगे,

या तो फिर गुलाम हो जाना,या आखिर तक लड़ लेना,
सारे घर को ज़हर खिलाना,या फिर कलमा पढ़ लेना,

                         ------कवि गौरव चौहान
नोट- ये कविता सिर्फ बांग्लादेशी मुसलामानों की आलोचना करती है(चाहे जैसे शेयर करें पर करें ज़रूर ताकि दिल्ली में रहने वाला हर मध्यमवर्गीय हिन्दू परिवार अपना भविष्य सुरक्षित कर सके|