"करता हूं अनुरोध आज मैं , भारत की सरकार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार
से........."
"वर्ना रेल पटरियों पर जो , फैला आज तमाशा है ,"
"जाट आन्दोलन से फैली , चारो ओर निराशा
है........."
"अगला कदम पंजाबी बैठेंगे , महाविकट हडताल
पर ,"
"महाराष्ट में प्रबल मराठा , चढ़ जाएंगे भाल पर........."
"राजपूत भी मचल उठेंगे , भुजबल के हथियार से
,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार
से........."
"निर्धन ब्राम्हण वंश एक , दिन परशुराम बन जाएगा ,"
"अपने ही घर के दीपक से , अपना
घर जल जाएगा........"
"भडक उठा गृह युध्द अगर , भूकम्प भयानक आएगा ,"
"आरक्षण वादी नेताओं का , सर्वस्व मिटाके
जायेगा........"
"अभी सम्भल जाओ मित्रों , इस स्वार्थ भरे व्यापार
से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार
से........"
"जातिवाद की नही , समस्या मात्र
गरीबी वाद है ,"
"जो सवर्ण है पर गरीब है , उनका क्या अपराध
है........."
"कुचले दबे लोग जिनके , घर मे न चूल्हा जलता है ,"
"भूखा बच्चा जिस कुटिया में , लोरी खाकर पलता
है........"
"समय आ गया है उनका , उत्थान कीजिये प्यार से
,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार
से........."
"जाति गरीबी की कोई
भी , नही मित्रवर होती
है ,"
"वह अधिकारी है जिसके घर , भूखी
मुनिया सोती है........"
"भूखे माता-पिता , दवाई बिना तडपते रहते है ,"
"जातिवाद के कारण , कितने लोग वेदना सहते है........."
"उन्हे न वंचित करो मित्र , संरक्षण के अधिकार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार
से........."
भारत माता की जय ||
Tuesday, 31 May 2016
आरक्षण
Wednesday, 27 April 2016
रावण और राम
रावण तुम कभी मर नहीं सकते
क्योंकि तुम्हारे बिना राम को लोग
कभी समझ नहीं सकते
बरसों से जला रहे हैं तुम्हारे पुतले
तुम्हारे दोषों को गिनाते हुए
हर बार तुम्हारी बरसी पर
रामजी जैसे बनने की सौगंध खाते हैं
पर तुम्हारा पुतला फूँकने के बाद भूल जाते हैं
रामजी की भक्ति करने की बजाय
तुम्हारे जैसे सुखों की तलाश में जुट जाते हैं
भक्ति के लिए बैठने की बजाय
तुम्हारी तरह माया के पीछे
दौड़ने में ही वह सुख पाते हैं
तुमने जो भेजा था मारीचि को
सोने का मृग बनाकर
सीता को भरमाने के लिए
राम तो जानते हुए उस छल में फंसे थे
रामजी का बाण खाकर वह भी
हुआ ऐसा अमर कि
पूरी दुनिया के लोग जानते हुए भी
मृग- मारिचिका में फंसने से ही मौज पाते हैं
युद्ध में रामजी का बाण खाकर
उनका दर्शन करते हुए प्राण त्यागते हुए
तुमने पाया है अमरत्व
रामजी का तो लोग लेते हैं नाम
मार्ग तो तुम्हारे ही पर चलते जाते ह
कर्ण और कृष्ण संवाद - रामधारी सिंह 'दिनकर'
सुन-सुन कर कर्ण अधीर हुआ,
क्षण एक तनिक गंभीर हुआ,
फिर कहा "बड़ी यह माया है,
जो कुछ आपने बताया है
दिनमणि से सुनकर वही कथा
मैं भोग चुका हूँ ग्लानि व्यथा
"मैं ध्यान जन्म का धरता हूँ,
उन्मन यह सोचा करता हूँ,
कैसी होगी वह माँ कराल,
निज तन से जो शिशु को निकाल
धाराओं में धर आती है,
अथवा जीवित दफनाती है?
"सेवती मास दस तक जिसको,
पालती उदर में रख जिसको,
जीवन का अंश खिलाती है,
अन्तर का रुधिर पिलाती है
आती फिर उसको फ़ेंक कहीं,
नागिन होगी वह नारि नहीं
"हे कृष्ण आप चुप ही रहिये,
इस पर न अधिक कुछ भी कहिये
सुनना न चाहते तनिक श्रवण,
जिस माँ ने मेरा किया जनन
वह नहीं नारि कुल्पाली थी,
सर्पिणी परम विकराली थी
"पत्थर समान उसका हिय था,
सुत से समाज बढ़ कर प्रिय था
गोदी में आग लगा कर के,
मेरा कुल-वंश छिपा कर के
दुश्मन का उसने काम किया,
माताओं को बदनाम किया
"माँ का पय भी न पीया मैंने,
उलटे अभिशाप लिया मैंने
वह तो यशस्विनी बनी रही,
सबकी भौ मुझ पर तनी रही
कन्या वह रही अपरिणीता,
जो कुछ बीता, मुझ पर बीता
"मैं जाती गोत्र से दीन, हीन,
राजाओं के सम्मुख मलीन,
जब रोज अनादर पाता था,
कह 'शूद्र' पुकारा जाता था
पत्थर की छाती फटी नही,
कुन्ती तब भी तो कटी नहीं
"मैं सूत-वंश में पलता था,
अपमान अनल में जलता था,
सब देख रही थी दृश्य पृथा,
माँ की ममता पर हुई वृथा
छिप कर भी तो सुधि ले न सकी
छाया अंचल की दे न सकी
"पा पाँच तनय फूली फूली,
दिन-रात बड़े सुख में भूली
कुन्ती गौरव में चूर रही,
मुझ पतित पुत्र से दूर रही
क्या हुआ की अब अकुलाती है?
किस कारण मुझे बुलाती है?
"क्या पाँच पुत्र हो जाने पर,
सुत के धन धाम गंवाने पर
या महानाश के छाने पर,
अथवा मन के घबराने पर
नारियाँ सदय हो जाती हैं
बिछुडोँ को गले लगाती है?
"कुन्ती जिस भय से भरी रही,
तज मुझे दूर हट खड़ी रही
वह पाप अभी भी है मुझमें,
वह शाप अभी भी है मुझमें
क्या हुआ की वह डर जायेगा?
कुन्ती को काट न खायेगा?
"सहसा क्या हाल विचित्र हुआ,
मैं कैसे पुण्य-चरित्र हुआ?
कुन्ती का क्या चाहता ह्रदय,
मेरा सुख या पांडव की जय?
यह अभिनन्दन नूतन क्या है?
केशव! यह परिवर्तन क्या है?
"मैं हुआ धनुर्धर जब नामी,
सब लोग हुए हित के कामी
पर ऐसा भी था एक समय,
जब यह समाज निष्ठुर निर्दय
किंचित न स्नेह दर्शाता था,
विष-व्यंग सदा बरसाता था
"उस समय सुअंक लगा कर के,
अंचल के तले छिपा कर के
चुम्बन से कौन मुझे भर कर,
ताड़ना-ताप लेती थी हर?
राधा को छोड़ भजूं किसको,
जननी है वही, तजूं किसको?
"हे कृष्ण ! ज़रा यह भी सुनिए,
सच है की झूठ मन में गुनिये
धूलों में मैं था पडा हुआ,
किसका सनेह पा बड़ा हुआ?
किसने मुझको सम्मान दिया,
नृपता दे महिमावान किया?
"अपना विकास अवरुद्ध देख,
सारे समाज को क्रुद्ध देख
भीतर जब टूट चुका था मन,
आ गया अचानक दुर्योधन
निश्छल पवित्र अनुराग लिए,
मेरा समस्त सौभाग्य लिए
"कुन्ती ने केवल जन्म दिया,
राधा ने माँ का कर्म किया
पर कहते जिसे असल जीवन,
देने आया वह दुर्योधन
वह नहीं भिन्न माता से है
बढ़ कर सोदर भ्राता से है
"राजा रंक से बना कर के,
यश, मान, मुकुट पहना कर के
बांहों में मुझे उठा कर के,
सामने जगत के ला करके
करतब क्या क्या न किया उसने
मुझको नव-जन्म दिया उसने
"है ऋणी कर्ण का रोम-रोम,
जानते सत्य यह सूर्य-सोम
तन मन धन दुर्योधन का है,
यह जीवन दुर्योधन का है
सुर पुर से भी मुख मोडूँगा,
केशव ! मैं उसे न छोडूंगा
"सच है मेरी है आस उसे,
मुझ पर अटूट विश्वास उसे
हाँ सच है मेरे ही बल पर,
ठाना है उसने महासमर
पर मैं कैसा पापी हूँगा?
दुर्योधन को धोखा दूँगा?
"रह साथ सदा खेला खाया,
सौभाग्य-सुयश उससे पाया
अब जब विपत्ति आने को है,
घनघोर प्रलय छाने को है
तज उसे भाग यदि जाऊंगा
कायर, कृतघ्न कहलाऊँगा
"कुन्ती का मैं भी एक तनय,
जिसको होगा इसका प्रत्यय
संसार मुझे धिक्कारेगा,
मन में वह यही विचारेगा
फिर गया तुरत जब राज्य मिला,
यह कर्ण बड़ा पापी निकला
"मैं ही न सहूंगा विषम डंक,
अर्जुन पर भी होगा कलंक
सब लोग कहेंगे डर कर ही,
अर्जुन ने अद्भुत नीति गही
चल चाल कर्ण को फोड़ लिया
सम्बन्ध अनोखा जोड़ लिया
"कोई भी कहीं न चूकेगा,
सारा जग मुझ पर थूकेगा
तप त्याग शील, जप योग दान,
मेरे होंगे मिट्टी समान
लोभी लालची कहाऊँगा
किसको क्या मुख दिखलाऊँगा?
"जो आज आप कह रहे आर्य,
कुन्ती के मुख से कृपाचार्य
सुन वही हुए लज्जित होते,
हम क्यों रण को सज्जित होते
मिलता न कर्ण दुर्योधन को,
पांडव न कभी जाते वन को
"लेकिन नौका तट छोड़ चली,
कुछ पता नहीं किस ओर चली
यह बीच नदी की धारा है,
सूझता न कूल-किनारा है
ले लील भले यह धार मुझे,
लौटना नहीं स्वीकार मुझे
"धर्माधिराज का ज्येष्ठ बनूँ,
भारत में सबसे श्रेष्ठ बनूँ?
कुल की पोशाक पहन कर के,
सिर उठा चलूँ कुछ तन कर के?
इस झूठ-मूठ में रस क्या है?
केशव ! यह सुयश - सुयश क्या है?
"सिर पर कुलीनता का टीका,
भीतर जीवन का रस फीका
अपना न नाम जो ले सकते,
परिचय न तेज से दे सकते
ऐसे भी कुछ नर होते हैं
कुल को खाते औ' खोते हैं
"विक्रमी पुरुष लेकिन सिर पर,
चलता ना छत्र पुरखों का धर.
अपना बल-तेज जगाता है,
सम्मान जगत से पाता है.
सब देख उसे ललचाते हैं,
कर विविध यत्न अपनाते हैं
"कुल-गोत्र नही साधन मेरा,
पुरुषार्थ एक बस धन मेरा.
कुल ने तो मुझको फेंक दिया,
मैने हिम्मत से काम लिया
अब वंश चकित भरमाया है,
खुद मुझे ढूँडने आया है.
"लेकिन मैं लौट चलूँगा क्या?
अपने प्रण से विचरूँगा क्या?
रण मे कुरूपति का विजय वरण,
या पार्थ हाथ कर्ण का मरण,
हे कृष्ण यही मति मेरी है,
तीसरी नही गति मेरी है.
"मैत्री की बड़ी सुखद छाया,
शीतल हो जाती है काया,
धिक्कार-योग्य होगा वह नर,
जो पाकर भी ऐसा तरुवर,
हो अलग खड़ा कटवाता है
खुद आप नहीं कट जाता है.
"जिस नर की बाह गही मैने,
जिस तरु की छाँह गहि मैने,
उस पर न वार चलने दूँगा,
कैसे कुठार चलने दूँगा,
जीते जी उसे बचाऊँगा,
या आप स्वयं कट जाऊँगा,
"मित्रता बड़ा अनमोल रतन,
कब उसे तोल सकता है धन?
धरती की तो है क्या बिसात?
आ जाय अगर बैकुंठ हाथ.
उसको भी न्योछावर कर दूँ,
कुरूपति के चरणों में धर दूँ.
"सिर लिए स्कंध पर चलता हूँ,
उस दिन के लिए मचलता हूँ,
यदि चले वज्र दुर्योधन पर,
ले लूँ बढ़कर अपने ऊपर.
कटवा दूँ उसके लिए गला,
चाहिए मुझे क्या और भला?
"सम्राट बनेंगे धर्मराज,
या पाएगा कुरूरज ताज,
लड़ना भर मेरा कम रहा,
दुर्योधन का संग्राम रहा,
मुझको न कहीं कुछ पाना है,
केवल ऋण मात्र चुकाना है.
"कुरूराज्य चाहता मैं कब हूँ?
साम्राज्य चाहता मैं कब हूँ?
क्या नहीं आपने भी जाना?
मुझको न आज तक पहचाना?
जीवन का मूल्य समझता हूँ,
धन को मैं धूल समझता हूँ.
"धनराशि जोगना लक्ष्य नहीं,
साम्राज्य भोगना लक्ष्य नहीं.
भुजबल से कर संसार विजय,
अगणित समृद्धियों का सन्चय,
दे दिया मित्र दुर्योधन को,
तृष्णा छू भी ना सकी मन को.
"वैभव विलास की चाह नहीं,
अपनी कोई परवाह नहीं,
बस यही चाहता हूँ केवल,
दान की देव सरिता निर्मल,
करतल से झरती रहे सदा,
निर्धन को भरती रहे सदा.
"तुच्छ है राज्य क्या है केशव?
पाता क्या नर कर प्राप्त विभव?
चिंता प्रभूत, अत्यल्प हास,
कुछ चाकचिक्य, कुछ पल विलास,
पर वह भी यहीं गवाना है,
कुछ साथ नही ले जाना है.
"मुझसे मनुष्य जो होते हैं,
कंचन का भार न ढोते हैं,
पाते हैं धन बिखराने को,
लाते हैं रतन लुटाने को,
जग से न कभी कुछ लेते हैं,
दान ही हृदय का देते हैं.
"प्रासादों के कनकाभ शिखर,
होते कबूतरों के ही घर,
महलों में गरुड़ ना होता है,
कंचन पर कभी न सोता है.
रहता वह कहीं पहाड़ों में,
शैलों की फटी दरारों में.
"होकर सुख-समृद्धि के अधीन,
मानव होता निज तप क्षीण,
सत्ता किरीट मणिमय आसन,
करते मनुष्य का तेज हरण.
नर विभव हेतु लालचाता है,
पर वही मनुज को खाता है.
"चाँदनी पुष्प-छाया मे पल,
नर भले बने सुमधुर कोमल,
पर अमृत क्लेश का पिए बिना,
आताप अंधड़ में जिए बिना,
वह पुरुष नही कहला सकता,
विघ्नों को नही हिला सकता.
"उड़ते जो झंझावतों में,
पीते सो वारी प्रपातो में,
सारा आकाश अयन जिनका,
विषधर भुजंग भोजन जिनका,
वे ही फानिबंध छुड़ाते हैं,
धरती का हृदय जुड़ाते हैं.
"मैं गरुड़ कृष्ण मै पक्षिराज,
सिर पर ना चाहिए मुझे ताज.
दुर्योधन पर है विपद घोर,
सकता न किसी विधि उसे छोड़,
रण-खेत पाटना है मुझको,
अहिपाश काटना है मुझको.
"संग्राम सिंधु लहराता है,
सामने प्रलय घहराता है,
रह रह कर भुजा फड़कती है,
बिजली-सी नसें कड़कतीं हैं,
चाहता तुरत मैं कूद पडू,
जीतूं की समर मे डूब मरूं.
"अब देर नही कीजै केशव,
अवसेर नही कीजै केशव.
धनु की डोरी तन जाने दें,
संग्राम तुरत ठन जाने दें,
तांडवी तेज लहराएगा,
संसार ज्योति कुछ पाएगा.
"हाँ, एक विनय है मधुसूदन,
मेरी यह जन्मकथा गोपन,
मत कभी युधिष्ठिर से कहिए,
जैसे हो इसे छिपा रहिए,
वे इसे जान यदि पाएँगे,
सिंहासन को ठुकराएँगे.
"साम्राज्य न कभी स्वयं लेंगे,
सारी संपत्ति मुझे देंगे.
मैं भी ना उसे रख पाऊँगा,
दुर्योधन को दे जाऊँगा.
पांडव वंचित रह जाएँगे,
दुख से न छूट वे पाएँगे.
"अच्छा अब चला प्रमाण आर्य,
हो सिद्ध समर के शीघ्र कार्य.
रण मे ही अब दर्शन होंगे,
शार से चरण:स्पर्शन होंगे.
जय हो दिनेश नभ में विहरें,
भूतल मे दिव्य प्रकाश भरें."
रथ से रधेय उतार आया,
हरि के मन मे विस्मय छाया,
बोले कि "वीर शत बार धन्य,
तुझसा न मित्र कोई अनन्य,
तू कुरूपति का ही नही प्राण,
नरता का है भूषण महान."
Monday, 25 April 2016
Beti Bachao Poem
एक औरत गर्भ से थी
पति को जब पता लगा
की कोख में बेटी हैं तो
वो उसका गर्भपात
करवाना चाहते हैं
दुःखी होकर पत्नी अपने
पति से क्या कहती हैं :-
सुनो,
ना मारो इस नन्ही कलि को,
वो खूब सारा प्यार हम पर
लुटायेगी,
जितने भी टूटे हैं सपने,
फिर से वो सब सजाएगी..
सुनो,
ना मारो इस नन्ही कलि को,
जब जब घर आओगे
तुम्हे खूब हंसाएगी,
तुम प्यार ना करना
बेशक उसको,
वो अपना प्यार लुटाएगी..
सुनो
ना मारो इस नन्ही कलि को,
हर काम की चिंता
एक पल में भगाएगी,
किस्मत को दोष ना दो,
वो अपना घर
आंगन महकाएगी..
ये सब सुन पति
अपनी पत्नी को कहता हैं :-
सुनो
में भी नही चाहता मारना
इसनन्ही कलि को,
तुम क्या जानो,
प्यार नहीं हैं
क्या मुझको अपनी परी से,
पर डरता हूँ
समाज में हो रही रोज रोज
की दरिंदगी से..
क्या फिर खुद वो इन सबसे अपनी लाज बचा पाएगी,
क्यूँ ना मारू में इस कलि को,
वो बहार नोची जाएगी..
में प्यार इसे खूब दूंगा,
पर बहार किस किस से
बचाऊंगा,
जब उठेगी हर तरफ से
नजरें, तो रोक खुद को
ना पाउँगा..
क्या तू अपनी नन्ही परी को,
इस दौर में लाना चाहोगी,
जब तड़फेगी वो नजरो के आगे, क्या वो सब सह पाओगी,
क्यों ना मारू में अपनी नन्ही परी को, क्या बीती होगी उनपे,
जिन्हें मिला हैं ऐसा नजराना,
क्या तू भी अपनी परी को
ऐसी मौत दिलाना चाहोगी..
ये सुनकर गर्भ से
आवाज आती है…..ं
सुनो माँ पापा-
मैं आपकी बेटी हूँ
मेरी भी सुनो :-
पापा सुनो ना,
साथ देना आप मेरा,
मजबूत बनाना मेरे हौसले को,
घर लक्ष्मी है आपकी बेटी,
वक्त पड़ने पर मैं काली भी बन जाऊँगी
पापा सुनो,
ना मारो अपनी नन्ही कलि को, तुम उड़ान देना मेरे हर वजूद को,
में भी कल्पना चावला की तरह, ऊँची उड़ान भर जाऊँगी..
पापा सुनो,
ना मारो अपनी नन्ही कलि को, आप बन जाना मेरी छत्र छाया,
में झाँसी की रानी की तरह खुद की गैरो से लाज बचाऊँगी…
पति (पिता) ये सुन कर
मौन हो गया और उसने अपने फैसले पर शर्मिंदगी महसूस
करने लगा और कहता हैं
अपनी बेटी से :-
मैं अब कैसे तुझसे
नजरे मिलाऊंगा,
चल पड़ा था तेरा गला दबाने,
अब कैसे खुद को तेरेे सामने लाऊंगा,
मुझे माफ़ करना
ऐ मेरी बेटी, तुझे इस दुनियां में
सम्मान से लाऊंगा..
वहशी हैं ये दुनिया
तो क्या हुआ, तुझे मैं दुनिया की सबसे बहादुर बिटिया
बनाऊंगा.
मेरी इस गलती की
मुझे है शर्म,
घर घर जा के सबका
भ्रम मिटाऊंगा
बेटियां बोझ नहीं होती..
अब सारे समाज में
अलख जगाऊंगा!!!
Thought
। कहाँ है सत्य ? ।।।
हम सत्य का समर्थन जरूर करते हैं ।मगर सत्य तक
पहुँच नहीं पाते ।हमारा राष्ट्रीय
उद्घोष है "सत्य मेव जयते"फिर भी
जीवन में दूर तक सत्याचरण नहीं है
।ऐंसा क्यों, ?
इसका सीधा उत्तर है हमारी गलत
अवधारणा ।हमारी गलत मान्यता ।सत्य जो
प्रत्यक्ष है वह नहीं है जबकि जिसके के
कारण प्रत्यक्ष दिख रहा है वह सत्य है ।जो दिख रहा
है वही सत्य होता तो सबको मिल गया होता
सत्य मिलता है सम्यक पुरुषार्थ से।हर
चमकीली वस्तु सोना नहीं
होती ।हर गतिमान को कोई स्थिर ही
चलाती है ।गाड़ी को चलाने वाला हवा,
पानी दिखाई देता है क्या? दिखाई देने वाला मकान न
दिखाई देने वाले नींव पर टिका है ।इसी
प्रकार सत्य भी चमकीले आवरण से
ढका है ।यह चमकीला आवरण है धन
लोलुपता,पदलोलुपता, स्वार्थ, द्वेष, ईष्या ।जब तक यह
बाहर का मिथ्याचरण, बाह्याडम्बर हमसे जुड़ है सत्य
हमसे दूर रहेगा ।
देखकर मत रीझना,ऊपर की सफाई पर
।
वर्क चाॅदी का चड़ा है, गोबर की मिठाई
पर ।
Saturday, 23 April 2016
Thoughts for the Day
इस संसार में जितने भी झंझट हुए हैं, उनके मूल में गरीबी ही प्रमुख कारण रही है।
यही क्रांतिकारी, पापी और अपराधी पैदा करती है।
यह ऐसी बीमारी है जो अच्छे-भले को गंदा-बुरा बना देती है।
इसलिए सुविचार बना....
बहुधा गरीबी...
क्रांति, पाप, अपराध
की जननी है
गरीबी के कारण भी आदमी, कभी चोरी-डकैती आदि का सहारा लेकर
पापी पेट को भरता है।
गरीब क्या जी पाएगा, क्या बढ़ पाएगा, क्या सुखी हो पाएगा?
अंत में सवाल भी है कि
क्या आप, पैसा न होने पर भी अपने व्यवहार और चरित्र को
बिगडऩे-गिरने-उजडऩे से रोक सकते है?
जय आर्यावर्त्त
Thoughts for the Day
इस संसार में जितने भी झंझट हुए हैं, उनके मूल में गरीबी ही प्रमुख कारण रही है।
यही क्रांतिकारी, पापी और अपराधी पैदा करती है।
यह ऐसी बीमारी है जो अच्छे-भले को गंदा-बुरा बना देती है।
इसलिए सुविचार बना....
बहुधा गरीबी...
क्रांति, पाप, अपराध
की जननी है
गरीबी के कारण भी आदमी, कभी चोरी-डकैती आदि का सहारा लेकर
पापी पेट को भरता है।
गरीब क्या जी पाएगा, क्या बढ़ पाएगा, क्या सुखी हो पाएगा?
अंत में सवाल भी है कि
क्या आप, पैसा न होने पर भी अपने व्यवहार और चरित्र को
बिगडऩे-गिरने-उजडऩे से रोक सकते है?
जय आर्यावर्त्त
वीर महाराणा प्रताप
जलती रही जोहर मे नारियॉ भेड़िये फिर भी मौन थे |
हमे पढ़ाया अकबर महान,तो फिर महाराणा कौन थे ||
क्या वो नही महान जो बड़ी बड़ी सेनाऔ पर चढ जाता था |
या वो महान था जो सपने मे प्रताप को देख डर जाता था ||
रणभुमि मे जिनके होंसले,दुश्मनो पर भारी पड़ते थे |
ये वो भुमि हे जहॉ पर नरमुण्ड घण्टो तक लड़ते थे ||
रानियो का सौन्दर्य सुन कर वो वहसी
कँई बार आए |
धन्य थी क्षत्राणियॉ,उनकी अस्थियाँ तक छु नही पाए ||
अपने सिंहो को वो सिंहनिया फोलाद बना देती थी |
जरुरत जब पड़ती,काटकर शीश थाल सजा देती थी ||
पराजय जिनको कभी सपने मे भी स्वीकार नही थी |
अपने प्राणो को मोह करे,वो पीढी इतनी गद्धार नही थी ||
वो दुश्मनो को पकड़ कर निचोड़ दिया करते थे |
पर उनकी बेगमो को भी माँ कहकर छोड़ देते थे ||
तो सुनो यारो ऐसे वैशी दरिन्दो का जाप मत करो |
वीर सपुतो को बदनाम करने का पाप मत करो ||
Motivational Poem
अच्छा दिखने के लिये मत जिओ बल्कि अच्छा बनने के लिए जिओ!!
जो झुक सकता है वह सारी दुनिया को झुका सकता है!!
गंगा में डुबकी लगाकर तीर्थ किये हजार,
इनसे क्या होगा अगर बदले नहीं विचार!!
क्रोध हवा का वह झोंका है जो बुद्धि के दीपक को बुझा देता है!!
अगर बुरी आदत समय पर न बदली जाये तो बुरी आदत समय बदल देती है!!
हमेशा प्रेम की भाषा बोलिए,
इसे बहरे भी सुन सकते हैं और गुंगे भी समझ सकते हैं!!
चलते रहने से ही सफलता है,
रुका हुआ तो पानी भी बेकार हो जाता है..!!
झूठे दिलासे से स्पष्ट इंकार बेहतर है….
खुद की भुल स्वीकारने में कभी संकोच मत करो!!
अच्छी सोच, अच्छी भावना, अच्छा विचार मन को हल्का करता है!!
मुसीबत सब पर आती है, कोई बिखर जाता है और कोई निखर जाता है!!
सबसे अधिक समझदार वह है
जो अपनी कमियो को जानकर उनका सुधार कर सकता हो l
Motivational Quotes
हीथ में पैसा हो तो ताकत
महसूस होती है।
जबकि जेब खाली हो तो
सब कुछ बेमानी सा लगता है।
समृद्धि सुखदायी और दरिद्रता दुखदायी है।
सुविचार भी कहता है....
पैसा
आत्मशक्ति-आत्मविश्वास,
आशा-उत्साह भरता है,
जबकि
निर्धनता-दरिद्रता
लज्जा-ग्लानि, हीनता-निराशा
अमीरी ताकत देती है, जबकि
गरीबी कमजोरी।
बहुत अधिक तो नहीं, हाँ मगर, पर्याप्त धन तो जरूरी है ही।
अंत में सवाल भी है कि .
क्या आर्थिक संसाधन आपके आत्मविश्वास को बढ़ाते ही जा रहे हैं?
Sunday, 10 April 2016
Different Between India And Bharat
भारत में गॉंव है, गली है, चौबारा है.
इंडिया में सिटी है, मॉल है, पंचतारा है.
भारत में घर है, चबूतरा है, दालान है.
इंडिया में फ्लैट और मकान है.
भारत में काका है, बाबा है, दादा है, दादी है.
इंडिया में अंकल आंटी की आबादी है.
भारत में खजूर है, जामुन है, आम है.
इंडिया में मैगी, पिज्जा, माजा का नकली आम है.
भारत में मटके है, दोने है, पत्तल है.
इंडिया में पोलिथीन, वाटर व वाईन की बोटल है.
भारत में गाय है, गोबर है, कंडे है.
इंडिया में सेहतनाशी चिकन बिरयानी अंडे है.
भारत में दूध है, दही है, लस्सी है.
इंडिया में खतरनाक विस्की, कोक, पेप्सी है.
भारत में रसोई है, आँगन है, तुलसी है.
इंडिया में रूम है, कमोड की कुर्सी है.
भारत में कथडी है, खटिया है, खर्राटे हैं.
इंडिया में बेड है, डनलप है और करवटें है.
भारत में मंदिर है, मंडप है, पंडाल है.
इंडिया में पब है, डिस्को है, हॉल है.
भारत में गीत है, संगीत है, रिदम है.
इंडिया में डान्स है, पॉप है, आईटम है.
भारत में बुआ है, मौसी है, बहन है.
इंडिया में सब के सब कजन है.
भारत में पीपल है, बरगद है, नीम है.
इंडिया में वाल पर पूरे सीन है.
भारत में आदर है, प्रेम है, सत्कार है.
इंडिया में स्वार्थ, नफरत है, दुत्कार है.
भारत में हजारों भाषा हैं, बोली है.
इंडिया में एक अंग्रेजी एक बडबोली है.
भारत सीधा है, सहज है, सरल है.
इंडिया धूर्त है, चालाक है, कुटिल है.
भारत में संतोष है, सुख है, चैन है.
इंडिया बदहवास, दुखी, बेचैन है.
क्योंकि …
भारत को देवों ने रचाया है.
इंडिया को लालची, अंग्रेजों ने बसाया है.... """""।।। india हटाओ भारत लाओ।।।।।"《
Saturday, 9 April 2016
Excise Duty
क्या लोहा सोने से भी महंगा है ?
तो जब लोहे पर इक्साइज ड्यूटी है तो सोने पर क्यों नहीँ हो सकती ?
.... क्या स्वर्णकार देश के सबसे गरीब लोग हैं ...??
बिल्कुल नहीँ ! आम राय तो यही है कि यह वर्ग भारत के सबसे सम्पन्न वर्गों में आता है ।
तो फिर मात्र एक प्रतिशत के इक्साइज टैक्स पर इतना रोना धोना क्यों ? क्या धंधे में पारदर्शिता रखने की अपेक्षा उनसे नहीँ की जानी चाहिए ..?
ऐसा नहीँ है कि देश में पहली बार कोइ टैक्स लगा है । इससे पहले भी सेवा कर .... या अनेक प्रकार के सेस लगते रहे हैं ।
स्वर्णाभूषणों पर दस प्रतिशत से तीस प्रतिशत तक मेकिंग चार्ज के नाम पर ले लेते है यह लोग ..... इस पर कोई भी स्पष्ट नियम नहीँ है ।
और सबसे बुरी बात तो यह है कि आज गहने खरीद कर कल वापस करने जांय तो तीस प्रतिशत तक बट्टा काट लिया जाता है ....!!
मुनाफाखोरी को समझें -
1.मान लीजिए आप एक लाख रुपये(₹100000) का गहना खरीदते हैँ । अब इसमें मेकिंग चार्ज पच्चीस प्रतिशत है । इसका अर्थ यह हुआ कि वास्तविक सोना पचहत्तर हजार(₹75000) का ही है , तथा बनाने का चार्ज पच्चीस हजार(₹25000) रुपये ।
अगले दिन जब आप वापस करने जाते हैं तो सोने की मूल कीमत पर बीस प्रतिशत का बट्टा(₹12000) काट लिया जाता है ।
और आपके हाथ बचते हैँ महज ₹5800 ।
इसका अर्थ यह हुआ कि सुनार ने आपकी खून-पसीने की कमाई के बयालिस हजार रुपये (₹42000) बैठे हडप लिया .. !
2. आभूषण खरीदते समय गहने में लगे सस्ते पत्थरों तथा सजावटी समाग्री को सोने की कीमत पर तौल कर दिया जाता है ..... किन्तु अगले ही दिन जब आप वापस करने जाऐंगे तो सुनार पत्थरों को काट कर अलग कर देगा तथा सिर्फ सोना ही तौल कर लेगा ... वह भी बट्टा काट कर ...!
3. अक्सर आपसे बताया जाता है कि सोना 22 कैरेट का है ... किन्तु वह होता है 20 या 18 कैरेट का !
4. आप पुराने आभूषण को जब पालिश करवाने के लिए ले जाते हैं ... तो एक्वेरेजिया नामक तेजाब से गहने को धो कर कुछ सोना ही निकाल लेते हैं ।
गहना तो चमक जाता है .... पर आपका सोना कम हो जाता है !
ऐसा नहीँ कि इमानदार सुनार हैं ही नही ..... किन्तु सत्य यह भी है कि उपरोक्त बेइमानी बडे स्तर पर हो रही है ।
और अंतिम बात ...
क्या सूनारों के हालात देश के किसानों से भी खराब हैं ?
आज सूखा ग्रस्त महाराष्ट्र का किसान महज_तीन_रुपये प्रति कीलो की दर से प्याज बेच कर टेंकर का पानी खरीद रहा है!
कितने पत्रकारों/मीडिया ने इस विषय पर ध्यान आकर्षित किया?
किसान को खाद या कीट नाशक दवाऐं किस दर पर मिल रहे है ... या फिर मिल ही नहीँ रहे हैं, इस विषय पर कितने पत्रकारों या मीडिया ने विश्लेषण किया है?
आज जबकि मोदी सरकार ने किसानों के हित में अनेक सुरक्षा योजना तथा बीमा की ब्यवस्था कर रही है तो , देश के प्रबुद्ध नागरिकों को स्वर्णाभूषणों पर इस एक प्रतिशत टैक्स को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए ।