Monday, 25 April 2016

Thought

। कहाँ है सत्य ? ।।।
हम सत्य का समर्थन जरूर करते हैं ।मगर सत्य तक
पहुँच नहीं पाते ।हमारा राष्ट्रीय
उद्घोष है "सत्य मेव जयते"फिर भी
जीवन में दूर तक सत्याचरण नहीं है
।ऐंसा क्यों, ?
इसका सीधा उत्तर है हमारी गलत
अवधारणा ।हमारी गलत मान्यता ।सत्य जो
प्रत्यक्ष है वह नहीं है जबकि जिसके के
कारण प्रत्यक्ष दिख रहा है वह सत्य है ।जो दिख रहा
है वही सत्य होता तो सबको मिल गया होता
सत्य मिलता है सम्यक पुरुषार्थ से।हर
चमकीली वस्तु सोना नहीं
होती ।हर गतिमान को कोई स्थिर ही
चलाती है ।गाड़ी को चलाने वाला हवा,
पानी दिखाई देता है क्या? दिखाई देने वाला मकान न
दिखाई देने वाले नींव पर टिका है ।इसी
प्रकार सत्य भी चमकीले आवरण से
ढका है ।यह चमकीला आवरण है धन
लोलुपता,पदलोलुपता, स्वार्थ, द्वेष, ईष्या ।जब तक यह
बाहर का मिथ्याचरण, बाह्याडम्बर हमसे जुड़ है सत्य
हमसे दूर रहेगा ।
देखकर मत रीझना,ऊपर की सफाई पर

वर्क चाॅदी का चड़ा है, गोबर की मिठाई
पर ।

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