जलती रही जोहर मे नारियॉ भेड़िये फिर भी मौन थे |
हमे पढ़ाया अकबर महान,तो फिर महाराणा कौन थे ||
क्या वो नही महान जो बड़ी बड़ी सेनाऔ पर चढ जाता था |
या वो महान था जो सपने मे प्रताप को देख डर जाता था ||
रणभुमि मे जिनके होंसले,दुश्मनो पर भारी पड़ते थे |
ये वो भुमि हे जहॉ पर नरमुण्ड घण्टो तक लड़ते थे ||
रानियो का सौन्दर्य सुन कर वो वहसी
कँई बार आए |
धन्य थी क्षत्राणियॉ,उनकी अस्थियाँ तक छु नही पाए ||
अपने सिंहो को वो सिंहनिया फोलाद बना देती थी |
जरुरत जब पड़ती,काटकर शीश थाल सजा देती थी ||
पराजय जिनको कभी सपने मे भी स्वीकार नही थी |
अपने प्राणो को मोह करे,वो पीढी इतनी गद्धार नही थी ||
वो दुश्मनो को पकड़ कर निचोड़ दिया करते थे |
पर उनकी बेगमो को भी माँ कहकर छोड़ देते थे ||
तो सुनो यारो ऐसे वैशी दरिन्दो का जाप मत करो |
वीर सपुतो को बदनाम करने का पाप मत करो ||
Saturday, 23 April 2016
वीर महाराणा प्रताप
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